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भाषा-भाव-अनुभूति विलक्षण हो तो आप पूरी समष्टि को बना सकेंगे। पर उसके पहले आपकी कविता पहले आपको बनाएगी। जो कविता आपको नहीं बना सकती, वह किसी को नहीं बनाएगी।’

‘मायाराम की माया’ को मैं फार्स की श्रेणी में ही रखना चाहूंगा। इस नाटक की स्थितियों, घटनाओं और चरित्रों की बुनावट जयवर्धन ने फैंटेसी के अंदाज में की है। बाह्य यथार्थ से कोसों दूर, लेकिन आंतरिक यथार्थ के बहुत करीब और नाटक के अंत में ब्रह्मा का नारद से यह कहना ‘‘आप ठीक कह रहे हैं मुनिवर। एक इंसान की गलती की सजा समस्त इंसान को देना ठीक नहीं होगा। यह सृष्टि है। सृष्टि का चक्र सदा चलता रहेगा। हां, भविष्य में इंसान को बनाते समय इंसानियत थोड़ा ज्यादा डालनी होगी।’’

'अब भी अशेष' संकलन जीवन-द्रव्य से पुष्ट कविताई लिए है । जीवन-जगत् की छोटी-बड़ी चीजों में, उनकी साधारणता से भी ओम भारती अतिरिक्त एवं बड़ा अर्थ भरते रहे हैं । यह काम वे निजी और नये भाषायी रजिस्टर में करते हैं । हर अगली लिखत में वे जैसे स्वयं को भी नया करते चलते है । पुस्तक की शीर्षक-कविता काव्य-पाठ पर एक दिलचस्प वृष्टि है, जो कविता के संप्रेषित होने पर एक ईमानदार संदेह करती है ।

यह कहानी-संग्रह नए कथा क्षेत्र में सादगी, विस्तार और अनुपम अनुभवों से हमें संपन्न बनाता है।

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन से लिए गए ये साक्षात्कार पिछले पाँच दशकों के दौरान की उनकी वैचारिक यात्रा को प्रस्तुत करते हैं। अज्ञेय की गणना भारतीय भाषाओं के मूर्धन्य रचनाकारों, संपादकों और आलोचनात्मक निबंधकारों में होती है। हिंदी साहित्य के आधुनिक मूर्तिभंजक अलीकी रचनाकारों में उन्होंने अपने सृजन-मुहावरे से युग-प्रवर्तन किया है। साहित्य जगत् में रवीन्द्रनाथ और टी० एस० इलियट की तरह उनके सृजन और चिंतन का युगांतरकारी महत्त्व है। उनके रचना-कर्म से परिचित प्रबुद्ध पाठक जानते हैं कि जैसे उन्होंने कविता को नए मोड़, नया बौद्धिक मुहावरा दिया, वैसे ही उन्होंने उपन्यास, कहानी, निबंध, आलोचना, डायरी, यात्रावृत्त, पत्रकारिता तथा इंटरव्यू आदि विधाओं में एक अभिनव क्रांति की है।

मंटो की जिन्दगी ययां टुकडों में नहीं, संपूर्ण जीवनानुभव और समग्र कला-आनुभव के रूप से आकार लेती गई है और एक कला-फार्म में ढलती गई है । इस चुनौतीपूर्ण कार्य का नरेन्द्र मोहन ने आत्मीयता और दायित्व से ही नहीं, निस्संगता और साहस से पूरा किया है । उपलब्ध स्रोतों की गहरी पश्चात करते हुए लेखक घटनाओँ और प्रसंगों की भीतरी तहों में दाखिल हुआ है और इस प्रकार मंटो के जीवन-आख्यान और कथा-पिथक को बडी कलात्मकता से डी-कोड किया है ।

जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।

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प्रत्येक वनस्पति का वानस्पतिक नाम, अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के नाम दिए गए हैं । निघण्टुओं में आए उनके नामों का विस्तार से परिचय दिया गया है । वनस्पति के स्वरूप की जानकारी, प्राप्ति- स्थान, खेती करने का तरीका, रासायनिक संघटन, उद्योग और व्यापार में उसके उपयोग की विधि का विस्तार से वर्णन किया website गया है ।

किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 

कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।

राजेन्द्र यादव के इस विकट और अपने समय के सबसे जटिल व्यक्तित्व के विविध आयामों को समेटने की कोशिश करती हैं ये लेखिकाएँ गीताश्री के मंच से ।

समय की छाती पर खड़ा मुसलमान आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। ‘मुसलमानों’ को लेकर इतना कुछ कहा जा रहा है कि स्वयं मुसलमान भी इस चर्चित मुसलमान के बारे में नई-नई सूचनाएं सुनने की जिज्ञासा रोक नहीं पाता है।

श्री मधुरेश ने निःसंग मेध से रांगेय राघव के विषय में इस भ्रांति का भी निराकरण किया है कि रांगेय राघव ‘नस्लवादी’ थे। यह भयंकर आरोप डॉ. रामविलास शर्मा ने लगाया था। मधुरेश जी का यह मत मान्य है कि उस समय तक और आज तक, भारत के प्रागैतिहासिक युग (मोहन जोदड़ो) के विषय में निर्विवाद जानकारी उपलब्ध नहीं है और यह कि रांगेय राघव का ध्यान सर्वत्र ‘व्यवस्था’ पर केंद्रित रहता था और मानव शोषण और अत्याचार के विरोध पर तथा मानवतावादी प्रवाह की खोज पर। इसीलिए द्रविड़ों पर आर्य अत्याचार हो या मुसलमानों पर आंग्ल-आक्रमण हो, वह सर्वत्र हृदय से आक्रांत, शोषित, दमित के साथ रहते हैं और जालिमों का विरोध करते हैं, चाहे जुल्मी आर्य हो या अनार्य, यवन हो या ब्राह्मण, मुसलमान हो या कम्युनिस्ट। सर्वत्र राघव ने मानव-न्याय का परिचय दिया है। —डॉ. विश्वंभर नाथ उपाध्याय

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